अवधू, लीजहु वापस डिगरी

अवधू, लीजहु वापस डिगरी। 
यह डिगरी अति भारी अवधू, अब मोसों नहिं संभरी। 

जब - तब लोग सवाल उठावै, लागै सिर को घुमरी। 
बस मोरी ही डिगरी पर ये अस कस दुनियां उमड़ी ? 

मैं नहिं पागल या दिवालिया, सिटिजनशिप निज तगड़ी, 
उमर पचीसी है तो वाजिब कुर्सी, पनही- पगड़ी । 

नाहक घेर रहै सूरज को क्यों मिलिकै सब ढिबरी ?
मोसों याद करत मूरखजन क्यों अकबर को बिसरी?

कागवृंद क्यों पिक को पूछै, सुर- शिक्षण की डिगरी ? 
दूरदास बिन डिगरी के पिक गावै अद्भुत ठुमरी। 
 



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