बहुत आसान है
खुद को फिट कर लेना
समय के मुहावरे में
या शब्दों की समकालीन व्याख्या में
बह जाना भी
बहुत आसान है भाषा की अनजानी हवा में
बहुत मुश्किल है
समय के मुहावरे से बाहर निकल पाना
मुश्किल है
मुहावरे से बचकर निकलना भी
शब्दों में ठूंसे जा रहे अर्थों,
भाषा के इशारे के विरुद्ध होना तो
और भी मुश्किल है
समकाल हो या विषमकाल
बहुत मुश्किल है
कविता में वैचारिक हो जाना
बहुत आसान है
भाषा को दीवार बनाना
और भाषा को पुल बना लेना ?कितना मुश्किल !
बहुत आसान है
बनाना बांस से डंडे
उनपर लटकाना झंडेलेकिन बनाना एक बाँसुरी ?बहुत मुश्किल है
फूंक से खुद को बजाना
बहुत आसान है समझना
कि व्यवस्था की नदी में मुर्दे नहीं डूबते
और एक जिंदा डूब जाता हैमुश्किल होता है समझना
एक जिंदा मनुष्य क्या सचमुच इतना भारी होता है ?
और जब उसके डूबने के बाद
कोई डाक - टिकट जारी होता है
यह समझना और भी होता मुश्किल
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